New Delhi, 29 अगस्त . कृष्ण कुमार बिड़ला (केके बिड़ला) देश के उन गिने-चुने उद्योगपतियों में शामिल रहे हैं, जिन्होंने उद्योग, शिक्षा, साहित्य और सामाजिक जीवन में समान रूप से योगदान दिया और देश को आगे बढ़ाने में मदद की.
उन्होंने वस्त्र, चीनी, इंजीनियरिंग, जहाजरानी, उर्वरक और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे विविध क्षेत्रों की एक दर्जन से अधिक कंपनियों की बागडोर संभाली. वे एच.टी. मीडिया समूह के भी अध्यक्ष थे, जिसके अंतर्गत प्रकाशित हिन्दुस्तान टाइम्स उत्तर भारत का अग्रणी अंग्रेज़ी दैनिक है, जबकि ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ और ‘कादम्बिनी’ पत्रिका ने हिन्दी पाठकों के बीच विशेष प्रतिष्ठा अर्जित की.
केके बिड़ला का योगदान राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में हमेशा यादगार रहेगा. राजनीति के क्षेत्र में उन्होंने पहले Lok Sabha चुनाव में किस्मत आजमाई, लेकिन सफल नहीं हुए. इसके बाद वह 1984 से 2002 तक लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य चुने गए और विभिन्न संसदीय समितियों के सदस्य रहे. वे राष्ट्रीय एकीकरण परिषद, केंद्रीय उद्योग सलाहकार समिति और बोर्ड ऑफ़ ट्रेड जैसे महत्त्वपूर्ण निकायों से जुड़े रहे. स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया और आईसीआईसीआई के केंद्रीय बोर्डों के सदस्य होने के साथ-साथ उन्होंने एफआईसीसीआई के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी निभाई.
11 नवम्बर 1918 को राजस्थान के पिलानी में जन्मे के.के. बिड़ला ने 1939 में लाहौर विश्वविद्यालय से स्नातक (ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त की. 1997 में पांडिचेरी विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टर ऑफ लेटर्स (ऑनोरिस कॉजा) की मानद उपाधि से सम्मानित किया. वे बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (बिट्स), पिलानी के चेयरमैन और कुलपति भी रहे.
साहित्य और संस्कृति से उनका गहरा जुड़ाव था. उन्होंने के.के. बिड़ला फ़ाउंडेशन की स्थापना की, जो साहित्य, विज्ञान, दर्शन, कला, संस्कृति और खेलों में उत्कृष्ट योगदान को पुरस्कृत करता है. साथ ही, के.के. बिड़ला अकादमी के माध्यम से वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शोध को प्रोत्साहित किया. अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे दिल्ली में एक संग्रहालय और शोध केंद्र की स्थापना में जुटे हुए थे.
केक बिड़ला व्यवसायी होने के साथ-साथ कला और संस्कृति के प्रेमी थे. उन्होंने इंदिरा गांधी: रेमिनिसेंसिज़ और पार्टनर इन प्रोग्रेस जैसी पुस्तकें भी लिखीं. 31 जुलाई 2008 को पत्नी के अचानक निधन के बाद वे गहरे अवसाद में चले गए और मात्र एक महीने बाद 30 अगस्त 2008 को स्वयं भी इस संसार से विदा हो गए.
कृष्ण कुमार बिड़ला न केवल एक सफल उद्योगपति थे, बल्कि एक संवेदनशील साहित्य-प्रेमी, दूरदर्शी शिक्षाविद् और समाजसेवी भी थे. उनका जीवन उद्योग और संस्कृति, दोनों को जोड़ने वाला एक सेतु था.
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डीएससी//एएस
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