चतरा, 5 अप्रैल (हि.स.)। झारखंड और बिहार के सीमा पर स्थित माता कौलेश्वरी का मंदिर रामायण और महाभारत काल से जुड़ा है। संतान प्राप्ति की कामना को लेकर नवरात्र में यहां लाखों की संख्या में लोग पहुंचते हैं। 1755 फीट की ऊंचाई पर कोल्हुआ पहाड़ी की चोटी में माता कौलेश्वरी का यह प्राचीन मंदिर है। राजा विराट ने पहाड़ी की चोटी पर माता कौलेश्वरी की प्रतिमा स्थापित कराई थी। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां निवास किया था। द्राैपदी के संग पांडवों ने माता कौलेश्वरी की आराधना की थी। माता के इस स्वरूप की दुर्गा सप्तशती में भी वर्णन है। पुराणों में वर्णित राजा सूरथ ने भी यहां तपस्या की थी।पहाड़ी की चोटी में भी आकाश लोचन और भीम गुफा कई रहस्यों और मान्यताओं काे समेटे हुए है।
संतान प्राप्ति की कामना को लेकर यहां सालों भर लोगों का आना-जाना लगा रहता है। मन्नतें पूरी होने के बाद यहां मुंडन और बली चढ़ाने के लिए देश ही नहीं विदेशों से भी लोग पहुंचते हैं।
दुर्गा सप्तशती में एक श्लोक कुत्क्षो रक्षेत कुलेश्वरी का वर्णन है। आसपास के लोगों में मान्यता है की माता कौलेश्वरी कुल और संतान की रक्षा करती हैं। दुर्लभ काले एक ही पत्थर को तराश कर मां कौलेश्वरी की एक 5 फीट ऊंची प्रतिमा का निर्माण किया गया है। चतुर्भुजी शक्ति स्वरूपा माता द्वापर कालीन हैं। आसपास के लोगों का माता के प्रति अटूट आस्था है। रामायण काल में वनवास के दौरान भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता ने भी यहां निवास किया था। यह मंदिर मोक्ष दायिनी फल्गु जिसे निरंजना भी कहा जाता है। यह मंदिर फल्गु की तट पर स्थित है। 40 एकड़ से अधिक भूमि में पहाड़ी फैला हुआ है। पहाड़ी की चोटी में एक प्राचीन सरोवर भी है। जिसमें सालों भर पानी रहता है।
वैसे तो यह भूमि तीन धर्मों की संगमस्थली मानी जाती है। माता कौलेश्वरी के प्रांगण में महात्मा गौतम बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ में उपदेश देने से पूर्व के कुछ दिन यहां बिताये थे। यह स्थल जैन धर्म के तीर्थंकर शीतल नाथ की स्मृतियों से भी जुड़ा हुआ है।
कौलेश्वरी मंदिर झारखंड का एक ऐसा धार्मिक तीर्थ स्थल है जिसकी ख्याति आसपास ही नहीं देश-विदेश में भी है। कई देशों के लोग यहां विभिन्न अनुष्ठान के लिए पहुंचते हैं। संभवतः झारखंड में यह एक मात्र ऐसा स्थल है। जहां धार्मिक गतिविधियों के लिए सर्वाधिक विदेशी पर्यटक पहुंचते हैं। यहां समान रूप से सनातन, बौद्ध और जैन धर्मावलंबी पहुंचते हैं और अपने-अपने आस्था के अनुसार पूजा अर्चना करते हैं।
इस स्थल का जिक्र महाभारत काल से लेकर दुर्गा सप्तशती में भी की जाती है। महाभारत काल में यह स्थल राजा विराट की राजधानी थी। यह स्थल झारखंड के चतरा जिले के हंटरगंज प्रखंड से 15 किलोमीटर दूर कोल्हुआ पहाड़ पर है। यह इलाका बिहार से सटा हुआ है। बौद्ध धर्म की मान्यता अनुसार यह जगह भगवान बुद्ध की तपोभूमि के साथ मोक्ष प्रदान करने का पवित्र तीर्थ स्थल है। यहां कई देशों के बौद्ध यात्री केशलूंठन अनुष्ठान के लिए पहुंचते हैं। यह जगह जैन धर्म के दसवें तीर्थंकर शीतल नाथ प्रभु का जन्म स्थान भी माना जाता है।
आचार्य चेतन पांडेय ने बताया कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भी माता कौलेश्वरी की आराधना की थी। उन्होंने कहा कि पहाड़ में मां कुलेश्वरी देवी का एक प्राचीन मंदिर है। माना जाता है कि जो भी सच्चे मन से यहां आते हैं उनकी मन्नते अवश्य पूरी होती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / जितेन्द्र तिवारी
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